Tuesday, December 29, 2009

कभी खुशी कभी गम भरा रहा बसपा के लिए यह साल

दो वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश की सत्ता में पूर्ण बहुमत से काबिज होने वाली बहुजन समाज पार्टी ने इस वर्ष हुए लोकसभा चुनावों में अपनी सुप्रीमो मायावती के लिए प्रधानमंत्री का ख्बाब देखा जो पूरा न हो सका परन्तु विधानसभा के उपचुनावों में आशातीत सफलता हासिल मिलने के बाद पार्टी के लिए यह वर्ष 'कभी खुशी कभी गम' जैसा रहा। अमेरिका के साथ हुई परमाणु संधि के कारण केन्द्र की सप्रंग सरकार से चुनावी वर्ष में अपना पल्ला झाड़ चुकी बसपा ने तीसरे मोर्चे से हाथ मिलाया और वामपंथी दलों ने मायावती को प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल करने का ऐलान करते हुए बसपा की आंखों में एक खूबसूरत सपना दे दिया। मायावती को प्रधानमंत्री का सपना दिखाकर वामपंथी दल भले ही पीछे हट गए लेकिन बसपा ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में मायावती को प्रधानमंत्री के रुप में पेश करते हुए हवा में यह नारा भी उछाल दिया 'यूपी हुई हमारी, अब दिल्ली की बारी।' वर्ष 2007 में हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में 403 सीटों में से 216 सीटें जीतने के बाद बसपा के रणनीतिकार वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में कम से कम 55 से 60 सीटें जीतने की उम्मीद बांधे हुए थे। उन्हें पूरा भरोसा था कि दलित वोट बैंक और सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले के साथ साथ सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से खफा मुसलमान को अपने साथ जोड़कर उत्तर प्रदेश में तीन चौथाई लोकसभा सीटें जीती जा सकती हैं, पर पासा उल्टा पड़ गया।बसपा के रणनीतिकारों का मायावती को प्रधानमंत्री बनाने का सपना तो पूरा हो न सका उल्टे पार्टी को 21 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। अपने टूटे फूटे संगठनात्मक ढांचे को लेकर दो दशकों से प्रदेश की राजनीति में हाशिए पर रही कांग्रेस ने बसपा सुप्रीमो के प्रधानमंत्री बनने तथा 'सत्ता की चाभी' हासिल करने के दोनों सपनों को तोड़ दिया और सपा मुखिया मुलयाम सिंह यादव से छिटके मुसलमानों के मत अपनी ओर खींच लिए। कांग्रेस ने बसपा के दलितों वोट बैंक में भी सेंध मारी जिससे बसपा को काफी नुकसान पहुंचा। देश की सत्ता पर काबिज हो पाने में असफल बसपा सुप्रीमो मायावती ने लोकसभा परिणामों के बाद बडे़ रोष भरे शब्दों में कहा कि सभी राजनीतिक दल एक दलित की बेटी को प्रधानमंत्री के पद पर नहीं देखना चाहते। वर्ष 2009 के अंत में हुए विधानसभा के उपचुनाव में भारी सफलता ने बसपा का हौसला बुंलद कर दिया। इन चुनावों बसपा ने सपा के गढ़ में सेंध मारी और कांग्रेस के दो केन्द्रीय मंत्रियों के क्षेत्रों में भी अपनी विजय पताका फहराई। विधानसभा उपचुनाव के पहले तीन और बाद में 11 सीटों पर हुए उपचुनावों में बसपा ने क्रमश: दो और नौ सीटों पर सफलता हासिल की। विधानसभा के उपचुनावों से पहले बसपा की विधानसभा में 216 सीटें थीं। उपचुनावों में 11 सीटों पर फतह हासिल कर उसकी विधानसभा में सीटों की संख्या 227 हो गई। उत्तर प्रदेश से बाहर अपना विस्तार करने के प्रयास में बसपा ने इस साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड सहित अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में अपने उम्मीदवार खड़े किए।पार्टी सुप्रीमो मायावती ने ताबड़तोड़ चुनावी रैलियां करके पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। लेकिन हरियाणा को छोड़कर किसी अन्य प्रदेश में पार्टी अपना खाता खोलने में नाकाम रही। हरियाणा में बसपा ने एक सीट जीती लेकिन उसके इकलौते विधायक ने पार्टी से किनारा करते हुए हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को अपना समर्थन देने की घोषणा कर दी। बहरहाल, बसपा ने मध्य प्रदेश, राजस्थान सहित कुछ राज्यों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए कुछ स्थानों पर स्थानीय निकायों के चुनावों में पहली बार जीत दर्ज की। उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी द्वारा मुख्यमंत्री मायावती के खिलाफ मुरादाबाद मे भड़काऊ भाषण देने के बाद कथित बसपा समर्थकों ने डा. जोशी के लखनऊ स्थित आवास पर आगजनी की जिससे बसपा की छवि को धक्का लगा। विपक्ष के दबाव में राज्य सरकार ने इस मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी। इस पूरे मामले में सीबीआई जांच की मांग करते हुए कांग्रेस ने सरकार पर हमला जारी रखा। पिछले वर्ष 2008 दिसम्बर में औरेया जिले में हुए अभियंता मनोज गुप्ता हत्याकांड मामले में मुख्य अभियुक्त बसपा विधायक शेखर तिवारी के शामिल होने और पकड़े जाने तथा उन पर मुकदमें की कार्रवाई वर्ष 2009 में चलती रही। बसपा सरकार के लिए वर्ष 2009 का एक बड़ा झटका यह भी रहा जब 18 सितंबर को लखनऊ में कांशीराम स्मारक स्थल पर निर्माण रोकने के हलफनामे का उल्लंघन करने के मामले में मायावती सरकार की दलील पर उच्चतम न्यायालय ने असंतोष जाहिर करते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियों पर रोक जारी रहेगी। स्मारक में निर्माण कार्य रोक दिया गया।वर्ष 2009 में बसपा में आने और बाहर निकाले जाने वालों का ताता लगा रहा। लोकसभा चुनाव के ठीक पहले सपा के कई कद्दावर नेताओं ने मुलायम सिंह का साथ छोड़कर मायावती की बसपा का दामन थाम लिया। इनमें राज्यसभा के सदस्य शाहिद सिद्दीकी और बनवारी लाल कंछल शामिल हैं। चुनाव के कुछ ही समय के बाद मायावती ने इनमें से ज्यादातर नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया। एक समय में बसपा संस्थापक कांशीराम के निकट सहयोगी और राज्यसभा सदस्य बलिहारी बाबू को भी मायावती ने पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए पार्टी से निष्काषित कर दिया। पलटवार करते हुए बलिहारी बाबू ने मायावती पर धोखे से राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिलवाने का आरोप लगाया और कांग्रेस में शामिल हो गए।

1 comment:

Udan Tashtari said...

विस्तार से जानकारी मिली!!


यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि आप हिंदी में सार्थक लेखन कर रहे हैं।

हिन्दी के प्रसार एवं प्रचार में आपका योगदान सराहनीय है.

मेरी शुभकामनाएँ आपके साथ हैं.

नववर्ष में संकल्प लें कि आप नए लोगों को जोड़ेंगे एवं पुरानों को प्रोत्साहित करेंगे - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

निवेदन है कि नए लोगों को जोड़ें एवं पुरानों को प्रोत्साहित करें - यही हिंदी की सच्ची सेवा है।

वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाएँ और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

आपका साधुवाद!!

नववर्ष की अनेक शुभकामनाएँ!

समीर लाल
उड़न तश्तरी